वर्षों तक ध्यान करने के बाद भी काम, क्रोध, लोभ क्यों नहीं जाते?
आत्मचिंतन • ध्यान • साक्षी भाव

वर्षों तक ध्यान करने के बाद भी काम, क्रोध, लोभ क्यों नहीं जाते?

वर्षों तक ध्यान करने के बाद भी यदि काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर — ये छह शत्रु आपका पीछा नहीं छोड़ते,

तो प्रश्न साधना पर नहीं,

समझ पर खड़ा होता है।

हमने ध्यान को भी एक लक्ष्य बना लिया है।

जैसे कोई उपलब्धि।

कोई ऐसी उपलब्धि जो एक दिन हमें “शुद्ध” बना देगी।

लेकिन क्या ध्यान का यही अर्थ है?

ध्यान कोई सफाई करने का यंत्र नहीं है।

न ही यह मन को काटकर अलग कर देने की कोई विधि है।

ध्यान तो केवल एक दर्पण है।

एक ऐसा दर्पण जिसमें आप स्वयं को जैसे हैं,

वैसे ही देख पाते हैं।

और यहीं से असली यात्रा शुरू होती है।

काम, क्रोध, लोभ को शत्रु मानना ही समस्या है

समस्या यह है कि हम अपने भीतर उठने वाले इन विकारों को शत्रु मानकर उनसे लड़ते हैं।

और जहां युद्ध है,

वहां शांति कैसे होगी?

आप क्रोध से लड़ते हैं,

तो क्रोध और सूक्ष्म रूप में भीतर छिप जाता है।

आप काम को दबाते हैं,

तो वह स्वप्नों में,

कल्पनाओं में,

अनजाने व्यवहार में

और भी प्रबल होकर लौट सकता है।

आपने ध्यान को भी repression — दमन का साधन बना लिया है।

और दमन कभी मुक्ति नहीं देता।

दमन केवल दबाव बनाता है।

और एक दिन वही दबाव विस्फोट बनकर बाहर आता है।

इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि क्रोध को कैसे खत्म करें?

प्रश्न यह है—

क्रोध को समझा कितना है?

ये छह विकार आपके शत्रु नहीं हैं

असल में ये विकार कोई बाहरी शत्रु नहीं हैं।

ये आपकी ही ऊर्जा के रूप हैं—

विकृत,

अनजाने,

अनदेखे।

काम वही ऊर्जा है जो प्रेम बन सकती है।

क्रोध वही शक्ति है जो करुणा में रूपांतरित हो सकती है।

लोभ वही प्रवृत्ति है जो खोज — seeking — में बदल सकती है।

इसी तरह मोह, मद और मत्सर भी केवल बाहर से आए हुए शत्रु नहीं हैं।

वे आपके ही भीतर की ऊर्जा के ऐसे रूप हैं जिन्हें आपने अभी समझा नहीं है।

लेकिन आपने इन ऊर्जाओं को समझने के बजाय उन्हें नकार दिया।

आपने उन्हें अंधेरे में धकेल दिया।

और फिर आश्चर्य करते हैं कि भीतर अंधेरा क्यों है।

ध्यान का अर्थ अंधकार को मिटाना नहीं है

ध्यान का अर्थ है—

अंधेरे में प्रकाश ले जाना।

अंधेरे को नकार देना नहीं।

जब आप ध्यान में बैठते हैं और भीतर काम उठता है,

तो आप तुरंत उसे हटाना क्यों चाहते हैं?

उसे देखें।

बस देखें।

बिना निर्णय के देखें।

न अच्छा,

न बुरा।

न स्वीकार,

न अस्वीकार।

केवल देखें।

क्योंकि जिस चीज को आप पूरी जागरूकता से देख लेते हैं,

उसके साथ आपका संबंध बदलने लगता है।

वही देखने की गहराई धीरे-धीरे उस ऊर्जा को बदल देती है।

ध्यान परिवर्तन का प्रयास नहीं है

ध्यान परिवर्तन का प्रयास नहीं है।

ध्यान समझ का विस्तार है।

और जहां समझ आती है,

वहां परिवर्तन अपने आप होता है।

आपने शायद वर्षों ध्यान किया,

लेकिन देखने की कला नहीं सीखी।

आप या तो भागते रहे,

या लड़ते रहे।

लेकिन देखने वाला साक्षी नहीं बन पाया।

यही कारण है कि ये विकार बने रहते हैं।

क्योंकि आपने उन्हें जड़ से नहीं समझा,

केवल शाखाओं को काटते रहे।

और जिस वृक्ष की जड़ जीवित है,

उसकी शाखाएं बार-बार उगेंगी।

साक्षी भाव क्या है?

एक और गहरी बात समझिए।

मन का स्वभाव ही तरंगित है।

विचार आएंगे।

भावनाएं उठेंगी।

काम आएगा।

क्रोध आएगा।

लोभ आएगा।

मोह आएगा।

जब तक आप मन से ही लड़ते रहेंगे,

आप उसी के भीतर उलझे रहेंगे।

ध्यान का सार यह है कि आप मन से थोड़ा हटकर खड़े हो जाएं।

यही साक्षी भाव है।

जब आप साक्षी बनते हैं,

तब अचानक एक दूरी बनती है।

क्रोध आता है,

लेकिन “आप” क्रोध नहीं बनते।

काम उठता है,

लेकिन “आप” उसमें बहते नहीं।

लोभ आता है,

लेकिन वह आपको अपने साथ खींच नहीं ले जाता।

धीरे-धीरे यह दूरी स्थिर होने लगती है।

और तब एक दिन आप पाते हैं—

विकार गए नहीं हैं,

लेकिन उनका आप पर अधिकार समाप्त हो गया है।

वे आते हैं,

जाते हैं।

जैसे आकाश में बादल आते-जाते हैं।

आकाश बादलों से लड़ता नहीं।

उन्हें रोकता नहीं।

बस उन्हें गुजरने देता है।

मुक्ति का अर्थ विकारों का नष्ट होना नहीं है

शायद यही ध्यान की सबसे गहरी बात है।

मुक्ति का अर्थ यह नहीं कि आपके भीतर कभी क्रोध उठेगा ही नहीं।

मुक्ति का अर्थ यह है कि क्रोध उठे,

लेकिन आप उसके स्वामी बने रहें।

काम आए,

लेकिन वह आपको बहा न ले जाए।

लोभ आए,

लेकिन वह आपकी चेतना पर अधिकार न कर सके।

विचार आएं,

लेकिन आप विचार न बन जाएं।

भावनाएं उठें,

लेकिन आप उनमें खो न जाएं।

यानी विकारों का अस्तित्व समाप्त होना आवश्यक नहीं।

उनका आप पर अधिकार समाप्त होना आवश्यक है।

तो फिर काम, क्रोध और बाकी विकार क्यों नहीं जाते?

तो प्रश्न यह नहीं कि—

“वे क्यों नहीं जाते?”

प्रश्न यह है—

“क्या आप सच में उन्हें देख पाए हैं?”

क्योंकि जिस क्षण देखने वाला पूर्ण हो जाता है,

देखी जाने वाली चीज अपनी शक्ति खोने लगती है।

ध्यान कोई युद्ध नहीं है।

ध्यान कोई दमन नहीं है।

ध्यान स्वयं को बदलने की जबरदस्ती भी नहीं है।

ध्यान एक प्रेमपूर्ण जागरण है।

और जहां जागरण है,

वहां अंधकार टिक नहीं सकता।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

वर्षों तक ध्यान करने के बाद भी काम, क्रोध और लोभ क्यों बने रहते हैं?

केवल लंबे समय तक ध्यान करना पर्याप्त नहीं है। जब हम भीतर उठने वाले विकारों को समझने के बजाय उनसे लड़ते या उन्हें दबाते हैं, तो उनका प्रभाव बना रह सकता है। ध्यान का उद्देश्य उन्हें जबरन समाप्त करना नहीं, बल्कि उन्हें जागरूकता और साक्षी भाव से देखना है।

क्या काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर को पूरी तरह समाप्त करना जरूरी है?

इस लेख का दृष्टिकोण यह है कि मुक्ति का अर्थ इन भावों का कभी उत्पन्न न होना नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि इनके उठने पर वे हमारी चेतना पर अधिकार न कर सकें।

ध्यान में क्रोध या काम जैसी भावनाएं उठें तो क्या करना चाहिए?

उन्हें तुरंत दबाने या हटाने के बजाय जागरूक होकर देखना चाहिए। बिना निर्णय के उस भाव को देखना साक्षी भाव की दिशा में अभ्यास हो सकता है।

साक्षी भाव का सरल अर्थ क्या है?

साक्षी भाव का अर्थ है अपने विचारों, भावनाओं और प्रतिक्रियाओं को उनसे पूरी तरह जुड़ जाने के बजाय जागरूक होकर देखना।

क्या ध्यान का उद्देश्य मन को पूरी तरह विचारहीन करना है?

नहीं। ध्यान का उद्देश्य विचारों और भावनाओं को जबरन समाप्त करना नहीं, बल्कि उनके प्रति जागरूकता विकसित करना है।

क्या ध्यान में विकारों का आना साधना की असफलता है?

नहीं। विकारों का उठना अपने आप में साधना की असफलता नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि साधक उन्हें पहचान पाता है या नहीं और उनके उठने पर जागरूक रह पाता है या नहीं।

क्या ध्यान में दमन और जागरूकता में अंतर है?

हाँ। दमन में व्यक्ति किसी विचार या भावना को भीतर दबाने का प्रयास करता है। जागरूकता में वह उसी अनुभव को बिना निर्णय के देखता है।

लेखक Prabhat Pandey Satya Anubhuti

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